पितृ पक्ष के आखिरी दिन इस विधि से करें श्राद्ध, प्रसन्न होंगे पितर

इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है।यदि किसी कारण से पितृ पक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से भूल गए हों या पितरों की तिथि याद नहीं हो तो इस तिथि पर श्राद्ध संपन्न किया जा सकता है।शास्त्रों के अनुसार इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितृरों का श्राद्ध हो जाता है।यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ है उनका भी इस अमावस्या तिथि को श्राद करना चाहिए।

इस दिन पिंड दान करने के लिए सफेद या पीले वस्त्र धारण करें।इस प्रकार श्राद्ध सम्पन्न करने से श्राद करने वाले सभी मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अंत काल में स्वर्ग का उपभोग करते हैं।धर्म ग्रंथों में पितृरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है। ‘सिद्दांत शिरोमणि’ ग्रन्थ के अनुसार चन्द्रमा की ऊर्ध्व कक्षा में पितृ लोक है।जहाँ पितृ निवास करते हैं।पितृ लोक को मनुष्य लोक से आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता है।जीवात्मा जब स्थूल शरीर से पृथक होती है। उस स्तिथि को मृत्यु कहते हैं।हिन्दू मान्यताओं के अनुसार एक वर्ष तक प्रायः सूक्ष्म जीव को नया शरीर नहीं मिलता है।

किस योनी में किस प्रकार मिलेगी तृप्ती

मोहवश वह सूक्ष्म जीव स्वजनों व घर के आसपास घूमता रहता है।श्राद्ध कर्म के अनुष्ठान से सूक्ष्म जीव को तृप्ति मिलती है।इसलिये श्राद्ध कर्म किया जाता है।पितृ लोक में गया प्राणी श्राद्ध में दिये हुए अन्न का स्वधा रूप में परिणत हुये को खाता है।यदि शुभ कर्म के कारण मर कर पिता देवता बन गया हो तो श्राद्ध में दिया हुआ अन्न उसे अमृत में परिणत होकर देवयोनी में प्राप्त होगा।यदि गंधर्व बन गया हो तो वह अन्न अनेक भोगों के रूप में प्राप्त होता है।पशु बन जाने पर घास के रूप में परिवर्तित होकर उसे तृप्त करेगा।यदि नागयोनी मिली तो श्राद्ध का अन्न वायु के रूप में तृप्ती को प्राप्त होगा।दानव,प्रेत व यक्ष योनी मिलने पर श्राद्ध का अन्न, अन्न पान और भोग्य रसादि के रूप में परिणत होकर प्राणी को तृप्त करेगा।

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